September 12, 2025

तेरा आंचल, मेरा समर्पण

सखी प्रिया: मेरा जीवन पुष्प तुम्हारे आंचल में समर्पित,ताकि तुम अपनी ममता भरी समझ से और इसे सुरभि पूर्ण बना सको !

शिवपुरी मंगलावर (शायनकाल) दिनांक 15/03/1983
क्षमा जैसी याचना का शिकार अभी मैं बन नहीं पाया, क्योंकि तुम्हारा खत ख्वाबो में जो लिखता रहा, आज उसे लिपि में फंसा रहा हूँ। ‌दुआएं जोकि राधाश्याम से तुम्हारे – हमारे शुभ हेतु की गयी, करता हूँ।

आपके पास गुजारे गए इन दिनों ने हालात कुछ इस कदर बदले हैं की जब भी अपने आप को छूता हूँ तो लगता है कि मैंने अपने आप को अपने द्वारा नहीं छुआ बल्कि आपने छुआ है मुझे। मैंने ज़िन्दगी (जो की गुजार चुका हूँ तेरे बगैर) मैं कभी सोचा भी नहीं था, मुझे स्वप्न तुल्य स्वर्गीय एक वक्त भी मिलेगा, जिसमें सब कुछ अजीब सा आनंद देगा तुम्हारी मौजूदगी पाकर। ये एक ख्वाब है जिसे हर कोई साकार चाहता है और रहेगा भी। परन्तु पूरा तो किसी किसी का ही हुआ है, हुआ भी उन्हीं का जिन्हें कोई हक़ नहीं था ख्वाबी ज़िन्दगी जीने का। मुझे तो डर है की कहीं मैं ही टूट कर बिखर न जाऊं इतना सारा आनंद भरा प्यार पाकर। हर लम्हा अब तुम्हारी याद का प्रतिरूप बन कर रह गया है। सोचता हूँ तुम्हारा सानिध्य पाने क पूर्व प्रयास करने से इतनी देर वंचित क्यों रहा। अगर तुम्हारा योग पूर्व ही मिलता तो मैं आज जो कुछ भी बनाया गया हूँ उसमें और निखार होता या फिर ज़िन्दगी ही कुछ और होती। आज जाना की किताबी – काल्पनिक प्यार कितना नीरस है सचमुच के प्यार से। जबकि तुम्हें छुआ भी नहीं है। (जिस्मों की प्रत्यक्षता और मन की मौजूदगी में) फिर भी ऐसा अहसास करने लगा हूँ कि माँ, भाई,बहन का स्नेह कुछ और ही था तुम्हारे प्यार से। इसमें तुम्हारे प्यार जैसा गाढ़ापन, सम्मोहन, जिज्ञासा आदि कुछ भी तो नहीं ! जब से तुम्हें देखा जानने की कोशिश करने लगा, पर थाह पाना अपनी क्षमता से परे रहा। मैंने तुम्हें क्या और किस किस से कम्पेयर नहीं किया किन्तु मुझे सब कुछ ही बौना महसूस हुआ तुमसे इस ज़िन्दगी में। आज अगर कहु की तुम प्रातः स्मरणीया कोई देवी हो ! तो पता हूँ कि तुम्हारा स्मरण तो कुछ ज्यादा ही ताज़गी और जोश भर देने की क्षमता रखता है, जो इन ईष्ट देवियों में नहीं। अगर कहूँ की तुम देवी की भांति वंदनीय हो दयालु हो तो पता हूँ की तुम अदृष्टया मर्यादा में ही मेरी पूजा – साधना से कहीं ज्यादा क्षमता का वर मुझे दे डालती हो ( मेरा तीन जगह उम्मीद के विपरीत चयनित होना)। अगर तुम्हें दोस्त भी समझूं तो भी अन्याय होगा तुमसे क्योंकि तुम्हारी यारी की खूबियां दोस्ती के दायरे से भी कुछ ज्यादा है। इन तमाम मुद्दों को नज़रअंदाज़ करते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पंहुचा हूँ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि समुद्र कूद कर भी मैं प्यासा रह जाऊं अपनी कमियों बस। आपने हर क्षेत्र में बाज़ी मारी है मुझे कहे बगैर। कभी समानता पर नहीं छोड़ा। बिताना तो दूर रहा। तुम्हारा वो कहना की ” मुझसे तुम्हे डर लगता है और मैं अलग ही रहा करुँगी कम से कम…. के वक़्त” मुझे और चिंता में जला रहा कि कहीं तुम वैसी ही तो नही ग़ैर सी कुछ। सच लिखूंगा तो आप कहेंगी कि मैं लोक लाज के प्रति मूढ़ हूँ या फिर समाज वाले भी मुझे वही कुछ कहेंगे जो कहना चाहिए उन्हें इन बातों पर। मेरा सारा सुख चैन अब तुम बन कर रह गये हो। इससे तुम हो तो सब कुछ है ग़र तुम नहीं तो एक ज़िन्दगी जिसमे मात्रा अँधेरा ही अँधेरा तो है ही साथ में दल दली कांटे और नुकीले काँचो भरा रास्ता होगा जिससे अभी तक प्यार न हो सका था। मेरे दोस्त की ये भावना “दौड़े आते हैं हम आपके दीदार को; एक आप हैं की नज़र नहीं आते”, कितनी सच लगती है। लगता है की अब ये भी संभव न हो सकेगा की कोई लम्हा ऐसा बने कि जिसमें तुम मेरे साथ हो। अजीब रीति रिवाज है लोगों के। मुझे बगैर प्यार के जिन्दा रहने पर मजबूर किया जा रहा है। अगर प्यार एक मौसम होता, तिथि होती जैसी की पंडित द्वारा विवाह के लिए मन द्वारा गाढ़ी गयी है तो फिर ये बगैर मौसम तिथि बनाया क्यों ? बच्चों का जन्म भी एक समय पर (सभी के ) एक समय पर क्यों नहीं जन्मते ? आखिर जब इन तमाम बातों के लिए कोई पाबन्दी नहीं तो फिर तुम्हारा हमारे साथ आना एक असभ्यता सूचक प्रश्न क्यों समझा जा रहा है या बनाया जा रहा है? तुम्हें जब अपनी यादों में निहारता हूँ तो मेरी रूह काँपती है; उन तमाम शुष्क तेज़ हवाओं को देखकर जो भौतिक अहसास से परे नहीं है की तुम्हारा रेशमी मखमली जिस्म मुरझा न दे ये। कितना अच्छा होता की तुम मुझमें न समाती। तुम्हारे मेरे क्रमशः विलीन होने से मैं अपनी आजादी गुमाता जा रहा हूँ कुछ इस कदर से। कल तक तो मैं अपने आप को कुछ समझाता था कि अपना स्तर और रख रखाव एक पूर्णतः बौद्धिक और सम्मानित (समाज में )व्यक्ति जैसा बनाऊंगा, प्रयास भी किये और सौ फीसदी अब तक सफल भी हुआ किन्तु तुम्हारी मौजूदगी में यह सब कुछ फीका लगने लगा जैसे मोमबत्ती का प्रकाश सूर्य की रौशनी में धुंधला जाता है। तुम्हारे लिए तो चाँद तारों को प्रस्तुत करना तो दूर है खुद को भी सहस्त्रों बार मिटा – मिटा प्रस्तुत किया जाये तो भी कम होगा। तुम्हारी आगवानी में प्रस्तुत वस्तुएं जो आपका यथोचित सम्मान कर सकेंगी कुछ भी नहीं सिवा इस उदास दिल के जो की अब तुमसे धड़कना सीख चुका है, तुमसे ही। तुम्हें देखकर लगता है कि अगर अब तक दी गयी उपमाओं से तुम्हारी उपमा करूँ तो आपका ही बेइज्जती होगी। जैसे चाँद का ही प्रतिरूप तुम्हें समझूँ तो गलत होगा क्योंकि चाँद को गुरूर होगा कि मुझे जबकि मैं मृतप्राय पिंड हूँ, ज़िन्दगी या आत्मा मुझमें नहीं और ऊपर से काले धब्बे भी अपने में पनपा रहा हूँ, कम से कम एक धरा की जीती जागती निर्मल देवी से compair किया जा रहा हूँ। तुम्हारी सटीक उपमा तुम खुद हो। हमारे लिए कम से कम है, जैसे कि किसी को उसके पुनः जीवित होने पर होती हो ठीक वैसी है शायद तुम्हें भी हो कौन जाने या कहे?वो ये कि मेरा (लगभग) लखनऊ का टूर कैसिल इससे अपनी हृद‌य वसना प्रिया का नेत्रो द्वारा निहार कर सकूँगा । ऐसा इसलिए संभव हुआ कि मिस्टर कनौजिया जी खुद ही २८ मार्च को जबलपुर जा रहे हैं। मुझे इन 16 दिनों के अवकाश ने लोगों के आकर्षण का केंद्र बना दिया है इससे और ज़्यादा गोल नहीं बनाउंगा। बरखुरदार को जबलपुर से ही पकड़ूंगा अब। मेरे लिए ये एक रहस्य बना है कि कहीं तुम आदमी रूप में कोई योगिनी -यक्षणी आदि तो नहीं जिसने मुझे परेशान करने के लिए जिस्मानी चौला अपनाया हो। तुम्हारा मुस्कृत चेहरा नजरों का खुद व खुद मनोभावों के अनुकूल उठना-गिरना, अब मुझे आदमी जैसी योनि का नही लगता जैसा कि कहानियों में पड़ता आया कहीं वही कुछ तुम तो नहीं। अपने मन-दर्पण में तुम्हारा स्वरूप डराता मैं ख़ुद गहराई से नहीं निहारता कि कहीं तुम्हें चोट न बैठ जाय।तुम वाकई अगर कोई दैविक स्वरुप हो तो मुझे लौकिक स्तर पर छोड़ दो यही मेरी प्रार्थना है मुझे अलौकिक आनंद देने के लिए बाध्य न करो। मैं एक साधारण व्यक्ति हूँ जो आदमी की तरह आदमी में जीना चाहता है अन्य में नहीं।

तुम अगर Ph.D वाली हो जाती तो मैं अपने को बद्किस्मत मानते हुए भी कुछ ज्यादा ही सुरक्षित समझता, क्योंकि मुझमें मानवीय अहसास तो है किन्तु दैवीय नही। फिर तुम्हारा पास रह कर भी अलग रहना कितनी बड़ी भारी विडंबना मेरे लिए। आज मेरे पास ऐसा कुछ भी तो नही जो तुम्हें बाध्य कर सके। आपकी मनाही मुझे एक कठिन तपस्या के लिए प्रेरित कर गयी है जो मुझे हर तरह से करनी पड़ेगी। भंग करवाना आपका दोष होगा। वैसे नियति के हाथ तो अब कुछ भी रहा नहीं है। सरोज, इंदू अपने से बहुत छोटे हैं उन्हें अभी सम्भालना है और हमारा संभालना (इनको) अभी बाकी है। इससे अपने उठने वाला हर कदम इतना सशक्त और मिशाली हो कि अंकल आंटी ही क्या सारा जमाना कह सके की ये वो मिशाल बनी है जिसमें रूढ़िवादिता और अंधविश्वास के प्रति जेहाद छेड़ा है। मुझे तो अब सभी कुछ से विलगाव हो चला है, तुम्हारा अपना लगाव देख देख कर। गर तुम्हारा निकटपन मुझे मिला तो मैं मात्र तुम्हारे नाम से ही ज़िन्दगी गुजार लूँगा, भूख प्यास जैसी बाधाओं से अप्रभावित बन कर। मैंने अब जाना (उस रात्रि के स्वामी द्वारा भजनों से व्युत्त्पन्न ध्वनि द्वारा ) कि सबकुछ अधूरा ही नहीं बल्कि नीरस प्यार बिना। मैं अब तक समझता था कि भौतिक वस्तुओं से ही सुख संम्पन्नता भरा संसार हासिल किया जा सकता है। ऐसी ही कुछ धारणा आम, आधुनिक, सभ्य पढ़े लोगों की है। यह ठीक एक मृगतृष्णा की तरह हकीकत से परे था। सोचता हूँ कि तुममें सब कुछ था और है भी तो मैं और कुछ अन्यथा पाने की मूर्खता पूर्ण कामना कैसे करता था। लोगों ने तुम्हे पाने की कोशिश की ये उनका बेहतरीन प्रयास था, पर पा न सके। ये उनका दर्दनाक हादसा और दुर्भाग्य का सूचक रहा है। ये बात और है कि मैंने तुम्हें हासिल ही नहीं किया बल्कि तुम्हें चाहकर तुम्हें ही मुझे चाहने के लिए मजबूर किया। इसका आभास इस बात से लगता है कि तुम्हारा मना करना कि तुम हम उन दिनों भी अलग अलग……. वे शायद तुम्हारे मन पर किसी की अमिट छाप अभी भी शेष है, जहाँ मैं पहुंच नहीं पाया हूँ शायद किसी ने ठीक कहा होगा की प्रथम प्यार बहुत बुरा होता, उसका असर तमाम उम्र नहीं जाता नही। अगर मेरे साथ ऐसा नही होता तो मैं तुम्हारे भला – बुरा कहने पर भी उल्टा उलझता ही क्यों रहता। वैसे मैं अब पूर्ण विश्वास और सकारण कह सकता हूँ कि तुम्हरा अपना दायरा अपने वर चयन हेतु मात्र स्तर को लेकर क्यों बना ? अब तक मैंने ज़िन्दगी को जीया नहीं बल्कि देखा हूँ दूर से। इससे इतराता रहा, कभी शादी करवाने के लिए, तो कभी न के लिए भी। अब बाकि ज़िन्दगी का हर लम्हा तुम्हारी जिस्म में डूबा और तुम्हारे खुशबू में नहाया हुआ चाहता हूँ। कौन जाने इस ज़िंदगी का पटाक्षेप हेतु आँखों को मूंदना पड़ जाये, और यादें मात्र यादें रह जाय। हकीकत में कुछ भी तब्दील न हो सके। कल वकील से मिल कर Court marriage के सम्बन्ध में पूछूंगा और फार्म आदि हासिल करने की कोशिश करूंगा।

” सूंघे जब अपना बदन उसकी ही खुशबू आये ,
ऐसा एक शक़्स भी था हमसे बिछड़ने वाला। “

“अजीब है ये दर्दोग़म के रिश्ते भी की
जिसको देखिये अपना दिखाई देता है “

मैं कभी गलत नही कहा करता था कि मैंने एक बहुत बड़ा ख्वाब देखा है जो सच तो हुआ पर मेरा आपका वजूद मिटा कर। मुझे किसी का प्रतिरूप बनना पड़ा, किसी को संजोने संवारने के लिए। काश हम भी किशोर वय में गलती करते और वक़्त पे पश्चाताप के आँसू तो गिराते। पत्रों के सिलसिले की ये आखिरी कड़ी है, अगर असल समझ हासिल न कर सका तो। ( इस तरह पत्र की )
पारस मणि के स्पर्श से विकपित लौह खंड रश्मिमयी स्वर्ण धातु में परिणित हो जाता है, अपेक्षित पाषाण कल्पनाशील शिल्पकार के कर संसर्ग में आकर वाक तत्पर प्रतिमा का रूप ग्रहण कर लेता है, ठीक ऐसे ही आपने मेरे जीवन में प्रवेश कर किसी सिद्धहस्त तांत्रिक की तरह मेरे सुप्त प्राणों में चेतना का संचार किया है। मेरा मन कैसे भी हो पर है तो मन ही। इससे क्षुद्र मनो भावों के उदगार पर क्रोधित न होईयेगा। पत्र की आशा तो जरूर होगी पर क्या ऐसा भी सच होगा की इंतज़ार परिणाम देगा

” ये वादा समां कुछ सुना तूने
मेहमान जो आज आने वाले हैं
तू कलियाँ न बिछा राहों में
हम आँखें बिछाये बैठे हैं। “
– कुशवाहा

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