“बरसात का मौसम “
मैं कहती हूं अपने मन की बात,
खोलती हूं ये राज ।
बारिश जब होती हैं,
बच्चा बन मेरा मन मचलता है,
झमाझम बरसात में भीगने को दिल करता है।
रस्ते पर पैर से पानी उछालू ,
बरसात के बाद गीले पेड़ को हिला दूं।
बूंदों का वो अहसास,
खुशी से भर देता है आज।
जब छत से गिरती थी बरसाती पानी की धार।
उसके नीचे खड़े होने पर सिर पर पड़ती थी थपेड़ो की मार।
वो पल था अनमोल,
सोच कर रोमांच से भर देता है रोज। पानी बहते ही सड़कों पर,
हम भी आ जाते थे लेकर अपनी कागज की नाव।
चलाते थे बड़े चाव से। दूर तक नजरे गड़ाए ।
ओझल न हो जाए जब तक अपनी प्यारी कागज की नाव ।
कोई नहीं अब फिर से बरसात में पेड़ पौधों को नहला दिया।
वातावरण से धुंध छट गया।
प्यारी, निर्मल, ठंडी पवन का झोंका आ गया।
हर दिल उमंग से भर गया।
हरयाली ने चारों ओर अपनी चादर बिछा दी !
सारी प्रकृति दुल्हन सी सज गई।
और आज की अमृत वर्षा में मैंने तन-मन भिगो दिया।
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