“गुरु “
गुरु शब्द अपने में सम्पूर्ण है ‘ आज गुरु पूर्णिमा का पावन दिन है हमारे जीवन में बहुत से गुरुओं का समावेश होता है ‘ जो हमें छोटी छोटी चीजे सीखा जाते है ‘औऱ हमें पता नहीं होता की हमारे पास ज्ञान का कितना भंडार भर जाता है। सर्वप्रथम गुरु पूर्णिमा के लिए इतना ही लिखूंगी गुरु+पूर्ण +माँ

अर्थात
सर्वप्रथम माँ ही पूर्ण गुरु है तत्पश्चात् गुरु ही पूर्ण माँ है इसलिए अधिक क्या लिखूँ !!
प्रथम -माँ का क्या गुणगान करू मेरे पास शब्द ही नहीं है ‘माँ अपने बच्चे को जन्म के ९ महीने पहले से जानती है ; वे हमारी परेशानी ,दर्द , चिंता सब चेहरा देखकर भाप जाती है बचपन से बड़े होने तक मेरा हाथ उन्होंने कभी नहीं छोड़ा हर समय हमारे लिए खड़ी रही हमेशा- हमेशा !
२- दूसरे गुरु पापा जी थे जिन्होंने एक अच्छा इंसान बनने की सीख दी। पापाजी ने ही मुझे अध्यात्म की और मोड़ दिया । मैंने पापा से ही सरल सच्चा और अपने प्रति ईमानदार रहने का पाठ सीखा !

तीसरे मेरे हमसफ़र थे – जिन्होंने हर परिस्थिति से लड़ना , डटे रहना सिखाया (पहले मैं बहुत सीधी साधी और डरपोक लड़की थी । मुझे अपनी बात भी रखना नहीं आती थी) इनमें निडरता तो कूट कूट कर भरी थी । यही गुण धीरे धीरे मुझ में आ गया | हमें कैसे रहना है अथवा अपना जीवन एक आदर्श तरीके से और समाज हमसे सीख लें ऐसा जीवन होना चाहिए। हमारी एक पहचान हो, जीते तो सभी लोग हैं पर हमारा ढंग बहुत ही शालीनता से भरा हो और समाज को हम क्या दे सकते हैं ?

फिर इनके जाने के बाद मुझे munger bihar के स्वामी निरंजनानंद जी मिले | जिनसे मैंने गुरु दीक्षा ली इंदौर में 2005 में जिनका दिया हुआ गुरूमंत्र आज भी में जपती हूँ |
गुरूवाणी :- 1 जो कुछ तुम्हें मिल रहा है , वह उसका वरदान है, तुम्हारे मंगल के लिए है | इस दशा में क्या कोई भी विगत पर दुःखी , आगत से असन्तुष्ट और अनागत के लिए परेशान रहेगा ?

2- ईश्वर प्राप्ति के बिना जीवन व्यर्थ है | योग के बिना यौवन बेकार है |
ध्यान के बिना बौद्धिक योग्यता बेकार है | शान्ति के बिना समृद्धि अभिशाप है | ब्रह्मचार्य के बिना मानवता एक परिहास है | उस अनन्त जीवन के बिना तुम मृतक तुल्य हों।
और जब उम्र के इस मोड़ में, मै स्वंय गुरु की भूमिका निभा रही हूँ | अपने तीनो बच्चो को आज भी सिखा रही हूँ | और जब तक यह जीवन रहेगा , जहाँ मुझे लगेगा कि इनको समझाना है, मैं जरूर- जरूर समझाओगी।

- Categories:
- प्रेरणास्रोत