अप्रैल 2025
30 मार्च से हमारा नया वर्ष (नव संवत्सर, विक्रम संवत- 2082) को शुरू हो गया है। 6 अप्रैल को नौ दुर्गा समाप्त हुई। इस बार एक दिन कम हो गया है। इन दिनों सभी पूजा, हवन, दुर्गासप्तशती का पाठ, कन्या पूजन सभी अच्छी तरह हो गया। पहली बार मैंने सही ढंग से पाठ की विधि समझी और उसे पूरा किया । दुर्गा सप्तसती की बुक (बुक फेयर) लाई थी।
अप्रैल शुरू होते ही एक दर्द भारी यादों का सिलसिला शुरू हो जाता है। 2002 8 अप्रैल को सोमवार का दिन और एकादशी थी। यह दिन जिसकी मैने सपने में भी कल्पना नहीं की थी। इस दिन के ठीक 1 महिने पहले मैंने सपने में देखा की एक चपरासी ने बेल बजाई और मुझसे कहा की साहब का एक्सीडेंट हो गया है, और साहब नहीं रहें। मैने उसे डांटते हुए कहा की ये कैसे हो सकता साहब आज ही भोपाल गये हैं। तुम्हें कुछ गल्तफहमी हो गई है। तब उसने कहाँ की नहीं, मैं अभी वहीं से आ रहा हूँ। और मैं जोर ज़ोर से रो रही हूँ। तब राम ने उठाया की क्या हो गया तुम इतनी जोर से क्यों रो रही है। मेरी आँखे, चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ है। तब मैंने अपने सपने की बात राम को बताई। और सिसकती हुई गले से लग गई।तब राम ने समझाया की पगली कहीं सपना भी सच होते हैं। अरे मेरी तो और उम्र बढ़ गई है। पर यह सपना कई दिन मेरे दिमाग़ में घूमता रहा फिर बात आई -गई हो गई और फिर 8 अप्रैल को ठीक वहीं घटना घटी जिसको होते हुए मैं पहले देख चुकी थी। हम कितना भी होनी को नाकार ले,पर जो होना है वह होता ही है । बस अब इस भरे संसार में, मैं बिल्कुल अकेली खड़ी थी , लग रहा था की मैं एक ऊँचे पहाड़ की नीचे दब गई हूँ। जहाँ मैं चेतना शून्य पड़ी थी, उस दिन का तो पता ही नहीं चला,मैं कोमा में जा चुकी थी । रात से सुबह हुई मुझे राम देखने नहीं मिलें।
डॉक्टर ने मना कर दिया था कि इन्हें बचाना है इनके छोटे-छोटे बच्चे हैं। यदि उनको कुछ हो गया तो बच्चों को फिर कौन देखेगा । 9 April को हमें अलग-अलग अस्पताल से घर ले जाया गया। पहले दमोह फिर बक्सवाहा ले जाया गया ‘जहाँ उन्हें हमेशा के लिए हम सबसे जुदा कर दिया । इस पूरी घटना को याद करके ही आँखें भर आती है। पूरा शरीर उन दिनों को याद करके काँपने लगता है। कैसे-कैसे दिन निकाले ,क्या -क्या सामना करना पड़ा। एक साल तक तो मैं यही कहती रही कि मुझे बस मरना हैं। फिर डॉ मौर्य ने समझाया की ठीक हैं यदि आप मर गई तो आपके २ प्यारे बच्चों को कौन सम्हालेगा और वे बिल्कुल अनाथ हो जायेगे और एक माँ से अच्छा बच्चों को कोई भी नहीं सम्हाल सकता ।फिर धीरे-धीरे दुनियादारी की तरफ मुड़ी ।तब तक मेरे मम्मी-पापा ने मुझे बहुत अच्छे से सम्हाला ,नहीं तो पता नहीं हम कहाँ होते ।
जिस इंसान ने कभी भी हमें कोई कमी नहीं होने दी , हम बड़े प्यार से रहें ,ना जाने क्या क्या कल्पना करते थे ।
एक गाना याद आ रहा है जो वो हमेशा गाया करते थे ।” मैं तेरे लिए एक सोने का बंगला बनवाऊँगा उसमें चाँदी की चाबी लगवाऊँगा । “बेइंतहा प्यार “करने वाला शख़्स जो अचानक हो हमें अपनों से दूर ले गया ।और छोड़ गया इस संसार का रूप देखने ?लोगों का रूप रंग बदलते हुए देखकर सोचती हूँ की हमने क्या खो दिया है। औरउसका प्यार, छत्रछाया में जीवन बिताना कितना स्वार्गिक था।
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